क्या आप जानते हैं? Indian Notes का वो सच जो 99% लोग नहीं जानते: कभी विदेशों की आधिकारिक करेंसी था हमारा रुपया

यह एक बहुत ही गहरा और विचारोत्तेजक विषय है। आज की पीढ़ी को लगता है कि Indian Notes हमेशा से केवल भारत की घरेलू मुद्रा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि यह एशिया और अफ्रीका के एक बड़े हिस्से की ‘कनेक्टिंग करेंसी’ हुआ करता था।

क्या आप जानते हैं? Indian Notes कभी केवल भारत की नहीं, बल्कि एक ‘क्षेत्रीय महाशक्ति’ की करेंसी था

अक्सर जब हम इतिहास की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान राजा-महाराजाओं और युद्धों पर रहता है। लेकिन अर्थशास्त्र के पन्नों में एक ऐसा सच छिपा है जिसे जानकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। क्या आपको पता है कि एक दौर ऐसा था जब भारतीय रुपया (INR) सरहदों का मोहताज नहीं था?

दुबई के रेगिस्तान से लेकर केन्या के बाजारों तक, भारतीय रुपया एक ‘Global Currency’ की तरह स्वीकार किया जाता था। आइए, इतिहास के उस अनसुने अध्याय को खंगालते हैं जिसके बारे में ज्यादातर भारतीयों को जानकारी नहीं है।


1. जब रुपया था ‘लीगल टेंडर’: खाड़ी देशों की पहली पसंद

1949: पाउंड डिवैल्यूएशन पर भारत ने 30% कटौती। $1 = ₹4.76 हो गया।

1960 के दशक के मध्य तक, कुवैत, बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों की अपनी कोई मुद्रा नहीं थी। इन देशों में भारतीय रुपया ही आधिकारिक मुद्रा (Legal Tender) के रूप में इस्तेमाल होता था।

1959 में भारत सरकार और RBI ने विशेष रूप से इन देशों के लिए ‘एक्सटर्नल रुपया’ या ‘गल्फ रुपया’ (Gulf Rupee) जारी किया था। इसका मूल्य भारतीय रुपये के बराबर ही था, बस इसका इस्तेमाल केवल विदेशी धरती पर व्यापार के लिए होता था।

2. सिल्क रोड से लेकर अफ्रीका के तटों तक का सफर

सिर्फ मध्य पूर्व (Middle East) ही नहीं, भारतीय रुपये की धमक और भी दूर तक थी:

  • तिब्बत और भूटान: हिमालयी क्षेत्रों में व्यापार के लिए भारतीय रुपया सबसे भरोसेमंद सिक्का था।
  • पूर्वी अफ्रीका: केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में भारतीय व्यापारियों के प्रभाव के कारण रुपया वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करता था।
  • दक्षिण-पूर्वी एशिया: ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा (म्यांमार) और मलेशिया के कुछ हिस्सों में भी रुपया ही चलता था।

3. क्यों माना जाता था इसे ‘क्षेत्रीय राजा’?

उस समय भारतीय रुपये की साख आज के डॉलर जैसी थी। इसके पीछे मुख्य कारण थे:

  • मजबूत व्यापारिक संबंध: भारत मसालों, कपड़ों और कीमती पत्थरों का सबसे बड़ा निर्यातक था।
  • स्थिरता: दुनिया भर के व्यापारियों को भारतीय मुद्रा की वैल्यू पर भरोसा था।
  • प्रवासियों का प्रभाव: खाड़ी देशों के विकास में भारतीय व्यापारियों और श्रमिकों की बड़ी भूमिका थी, जिससे रुपये का चलन वहां स्वाभाविक हो गया।

4. फिर यह ‘क्षेत्रीय करेंसी’ से ‘घरेलू’ कैसे हो गई?

1966 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) किया। इससे खाड़ी के देशों को लगा कि एक विदेशी मुद्रा पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। धीरे-धीरे इन देशों ने अपनी खुद की मुद्राएं (जैसे दीनार और दिरहम) बना लीं और रुपया भारत की सीमाओं के भीतर सिमट कर रह गया।

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आज का दौर: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?

आज 2026 में, हम एक बार फिर रुपये को उसी ऊँचाई पर देख रहे हैं। भारत अब कई देशों के साथ ‘Rupee Trade’ के समझौते कर रहा है। रूस, यूएई और कई अफ्रीकी देश अब डॉलर के बजाय रुपये में व्यापार करने को तैयार हैं। यह संकेत है कि रुपया फिर से अपनी खोई हुई वैश्विक पहचान वापस पा रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. ‘गल्फ रुपया’ (Gulf Rupee) क्या था? उत्तर: गल्फ रुपया भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी की गई एक विशेष मुद्रा थी, जिसका उपयोग 1959 से 1966 के बीच कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान जैसे खाड़ी देशों में आधिकारिक लेनदेन के लिए किया जाता था।

Q2. भारतीय रुपया किन-किन देशों में चलता था? उत्तर: 1960 के दशक तक भारतीय रुपया कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, बहरीन, ओमान, अदन (यमन) और भूटान की आधिकारिक या प्रमुख मुद्रा हुआ करता था। इसके अलावा पूर्वी अफ्रीका के कुछ देशों में भी इसका व्यापक प्रचलन था।

Q3. खाड़ी देशों ने भारतीय रुपये का उपयोग करना क्यों बंद कर दिया? उत्तर: 1966 में भारत सरकार ने आर्थिक संकट के कारण रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) किया, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत कम हो गई। अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए खाड़ी देशों ने धीरे-धीरे अपनी खुद की मुद्राएं (जैसे दीनार और दिरहम) जारी करना शुरू कर दिया।

Q4. क्या गल्फ रुपया और भारतीय रुपया एक ही थे? उत्तर: दोनों की कीमत (Value) बराबर थी, लेकिन उनकी पहचान अलग थी। गल्फ रुपये के नोटों का रंग अलग (ज्यादातर लाल या गुलाबी) रखा गया था ताकि उन्हें भारत के घरेलू बाजार में चलने वाले नोटों से अलग पहचाना जा सके और मुद्रा की तस्करी को रोका जा सके।

Q5. क्या आज भी भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य है? उत्तर: हाँ, 2026 में भारत ने कई देशों (जैसे रूस, श्रीलंका और यूएई) के साथ रुपये में व्यापार करने के समझौते किए हैं। भारत धीरे-धीरे अपनी मुद्रा को फिर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

निष्कर्ष

ज्यादातर भारतीयों के लिए यह सिर्फ एक नोट है, लेकिन इतिहास गवाह है कि यह रुपया कभी आधी दुनिया के व्यापार की भाषा था। इसे जानना केवल गर्व की बात नहीं है, बल्कि यह हमारी मजबूत आर्थिक विरासत का प्रमाण है।

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